मंगलवार, 29 मार्च 2011

बड़े दिन हुए

राह में भीड़ 
हर पड़ाव पर भीड़ 
भीड़ सपनों की, 
भीड़ अपनों की,
जाने क्यूँ सफ़र में 
है फिर भी तन्हाई .....

मंदिरों में पत्थर के बुत,
कार्यालय में कागज के पुलिंदे,
घर में सुविधाजनक उपकरण,
बड़े दिन हुए
माँ  ने पीठ नहीं थपथपाई....  

ऑफिस से घर तक 
चौखट और दीवारें ,
जहाँ से बाहर 
ना दे सुनाई और दिखाई.
बड़े दिन हुए ,
दोस्तों के साथ टपरी पर
चाय की चुस्की नहीं लगाईं...

माथे पर बल,
तनी हुई भौहें,
रंज तंज की बातें,
महत्वपूर्ण बातें,
बड़े दिन हुए 
बेबात के ठिठौली नहीं उड़ाई...

बेरंग से रंग, 
कभी फितरत के 
कभी सीरत के,
कुदरत के रंग जाने क्यों रूठे है,
इस बार होली में वो बात नहीं आई ..


रविवार, 9 जनवरी 2011

बातों बातों में....


दिल मस्त हवा के झोंके सा 
बह निकला बातों बातों में.....
मखमली खेतों से गुजरा 
बैठा छूक-छूक गाड़ी में, 
सपने भी हिचकोले खाते 
संग संग मेरी आँखों में, 
दिल मस्त हवा के झोंके सा 
बह निकला बातों बातों में.....

सर्दी की धुप सा अहसास
लिए रात की करवट थी,
तारे  बनकर छिटक गए अरमान,
जिन्हें सिरहाने रखकर सोता था रातों में,
दिल मस्त हवा के झोंके सा 
बह निकला बातों बातों में.....

मोटे मोटे सपने हों,
और छोटी छोटी खुशियाँ हो,
छोटा सा एक आँगन हो 
जिसमे थाम चलूँ 
तेरा हाथ मै हाथों में,
दिल मस्त हवा के झोंके सा 
बह निकला बातों बातों में.....






 


सोमवार, 27 दिसंबर 2010

Happy new year 2011

Happy new year 2011 
 
आओ २०११ तुम्हारा स्वागत है.
कामना है, २०१० की परछाई से तुम उबर पाओ,
अपने लिए कोई नया मुस्तकबिल तलाश पाओ..

अवकाश के उपग्रह के विफल हो गिरने से  
कंही  ज्यादा दर्द तब हुआ 
जब दिल्ली  में किसी तेज रफ़्तार कार से
एक अबला का दुपट्टा गिरा...

उम्मीद है तुम गिरो नहीं 
ऊँचे उठो 
इतना जहाँ से तुम साफ़ देख सको
कश्मीर की सडको पर बिछे नौनिहालों के शव,
आदर्श सोसाइटी की इमारत,
राष्ट्रकुल स्पर्धा का खोकला गुब्बारा,

 मै चाहता हूँ ,
तुम मुस्कुराओ ,
उन होंठो पर जो निवाला छूने को तरसते है...

मै चाहता हूँ 
तुम चमको सपना बनकर ,
उन आँखों में जो भीगी है,


भला ये भी क्या बात हुई ,
एक शाम,
एक जाम, 
और अगली सहर से कहानी वही आम,
कुछ तो नया हो इस नये साल में...

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

बलात्कार..


बैसाखियाँ  सभी ने  बांटी,
काश किसी ने दी होती 
पैरो में चलने की जान..
मिटटी के चूल्हे में 
दिल जल रहा था...
उबल रहे थे अरमान ..

तभी आदिवासी के दरवाजे पर दस्तक हुई,
आये थे एक और समाज सेवक मेहमान..
जुबान से शहद टपकाते 
पूरी झोपडी में नज़र घुमाते
हर जरुरत को भांपा ..
हर दर्द की गहराई को 
कागज पर नापा ...

जाते जाते समाज सेवक ने 
विश्वास से कहा 
आप पिछड़े है 
हम आपका करेंगे सुधार..

दर्द खुली इज्जत सा बिखर गया ,
बेबस गरीबी का 
फिर  हो गया  बलात्कार.... 

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

भ्रष्टाचार (Corruption in India)

भ्रष्टाचार की फितरत बदलिए 

      यह एक ऐसा अचार है जिसे खाता हर कोई है, पर पूछो तो कहते है खट्टा है नहीं खाना चाहिए. जब अरबों खरबों के भ्रष्टाचार की खबर आती है तो देश की आधी आबादी जो दो वक़्त के खाने को तरसती है, दिल ही दिल में कुढ़ के रह जाती है. पर जब दस की नोट दे कर गाँव में कोई सरकारी दाखला लेना हो तो कोई हर्ज नहीं. नेताजी से जब यही लोग किसी उत्सव का चंदा लेने पहुँचते है तो पचास हजार से कम नहीं मांगेंगे, क्या पता नहीं है यह पैसा कहाँ से आता है. सब चलता है...लोकसहभाग की योजनाओ में हमेशा लोगो का हिस्सा कोई ना कोई ठेकेदार भरता है ..पर अगर लोकनिर्माण की गुणवत्ता कमजोर है तो भ्रष्टाचार हो गया. स्कूल में ट्युशन, एडमिशन को डोनेशन से लेकर नौकरी पाने को गर्म की गयी जेबों तक हर कोई भ्रष्टाचार कर रहा है. इसीलिए तो किसी में इतना नैतिक साहस नहीं की छाती ठोक के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर सके. भ्रष्टाचार छोटा बड़ा नहीं होता ... आचरण भ्रष्ट है तो वो भ्रष्ट ही कहलायेगा. हम में से हर एक के जहन में एक सुरेश कलमाड़ी बैठा है. बस फर्क इतना है हमें छोटे मौके मिले तो हमने छोटे भ्रष्टाचार किया, कुछ लोगो को बड़ा मौका मिला तो उन्होंने  देश को बड़ा चुना लगा दिया. पर फितरत तो एक ही है. पद पर बैठे  मुख्यमंत्री बदले जा सकते है, फितरत बदलना मुश्किल है.  बाहर बैठे भ्रष्टाचार को गाली देने में क्या वीरता है, अगर हम बहादूर है तो जरा अपने आप से भ्रष्टाचार  को बाहर निकालिए.

बुधवार, 25 अगस्त 2010

मंजिल

मंजिल
हर दिल में कोई ना कोई जुस्तजू है,
पर ख्वाहिशो की जमीन पर हमेशा कलियाँ ही नहीं खिलती..
कुछ  लोग कर लेते  है उसूलों  की कीमत पर सौदे,
बाकियों को कोई समझाये मंजिलें मुफ्त नहीं मिलती.

शनिवार, 3 जुलाई 2010

मुट्ठी भर आकाश....

मुट्ठी भर आकाश....

सूरज होने का 
इतना अभिमान क्यूँ है तुमको,
जबकि हर शाम के बाद 
अन्धेरा ही है.
दीप सही मै छोटा सा,
अँधेरे से लड़ने का अधिकार
मेरा भी है..

पंछी होने का 
इतना अभिमान क्यूँ है तुमको,
आकाश से जहाँ लौटना होता है,
वो टहनियों पर बसेरा ही है.
किट सही मै छोटा सा,
पंख है 
तो मुट्ठी भर आकाश मेरा भी है..

वैभव कीर्ति और सफलता 
आज होंगे सिर्फ तुम्हारे,
पर प्रयास तो मेरा भी है,
विश्वास मेरा भी है..
पंख है 
तो मुट्ठी भर आकाश मेरा भी है..