शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

महाराष्ट्र माझा

महाराष्ट्र माझा 
     माझी आई बिहार ची आणि बाबा राजस्थान चे आहे, राज ठाकरे ला मान्य असो वा नसो पण हा महाराष्ट्र माझा पण आहे. अजुन ही आठवते, लहानपणी चौथ्या वर्गाच्या पुस्तकातुन बघून शिवाजी महाराजांचे चित्र काढणे हा माझा सर्वात आवडता छंद होता.शिवरायांच्या गोष्टी मनात इतक्या भिन्ल्या होत्या की लहानपणी ज्या मुस्लिम काकाच्या  दुकानात बसून स्कूल च्या बस ची वाट बघायचो त्यांना पावनखिंड आणि  अफजल खाना चा वध सारखे प्रसंग उत्साहाने सांगायचो. ते ही आवडीने लक्ष देऊन  ऐकायचे. माझ्या बस ला उशीर झाला तर आपल्या मुलाला स्कूटर घेउन माझ्या सोबत पाठवत होते.महाराष्ट्र त्या काकांचा पण आहे.


     आमच्या समाज च्या एका कार्यक्रमात ऐकले होते, आम्ही ब्राह्मन आहोत म्हणून सर्वश्रेष्ट आहोत. मला कधी समझले नाही, कसे? माझा लहानपणी चा सर्वात जवलचा मित्र संघरक्षित पाटिल. त्याच्या घरी देवालायत बुद्ध भगवान्  आणि डॉ. आम्बेडकर होते. मला तो सगळ्यात जवलचा आणि श्रेष्ठ वाटत होता. हा महाराष्ट्र आम्हा दोघां मित्रांचा पण आहे.

      मी हिंदीत छान काव्य लिहतो. आज ही माझी ओळख बनली आही, मात्र मी कविता करावी या साठी पहिल्यांदा प्रवृत्त केले आमच्या मराठी च्या शिक्षिका जाधव मैडम ने. मी हिंदीत काव्य लेखन करत होतो आणि त्या माझा मनोबल वाढवत होत्या. मात्र त्या होत्या म्हणून मराठी माझा सगळ्यात आवडता विषय बनला होता. हा महाराष्ट्र आम्हा गुरु शिष्यांचा पण आहे.

   अजुन ही डोळ्यात तो प्रसंग जिवंत आहे.अमरावतीच्या एका लहानश्या घोडचंदी गावातला भारतीय  सैन्याचा जवान, उम्केश्वर कडू. पाकिस्तानी अतिरेक्यंशी लढा देताना, गंभीर जख्मी झाला. जख्मी उम्केश्वर कडू ची शेवट ची इच्छा आई शी बोलण्या ची होती.मात्र तिन दिवस कलेक्टर ऑफिस मधून सादा निरोप ही या शाहिदा च्या घरी पठाविन्यत आला नाही.शासकीय यंत्रने कड़े  माहिती पोचली, मात्र  त्यानी कडू कुटुम्बाला उम्केश्वर जख्मी असल्याची बातमी दिली, ती मृत्यु ची बातमी घरी पोचल्या नंतर. गाँव पासून ११ किलो मीटर अंतरावरील एका किराणा दुकानदार च्या फ़ोन वर जेव्हा हे उम्केश्वर शहीद झाल्या चे दुखद वृत्त कलले, त्यानी दुकान ला कुलुप लावले आणि तसाच धावत सुटला कडू कुटुम्बाला निरोप देण्या साठी. हा महाराष्ट्र त्या दुकानदार चा आहे, संवेदना शून्य त्या शाशकीय अधिकार्यांचा नाही.
        जेव्हा मी अन्त्य संस्कराच्या कार्यक्रमाच्या ला कवर करण्यासाठी  दैनिक भास्कर कडून घोड्चंदी ला पोहचलो, सर्व राजकीय पक्षांचे कार्यकर्ते मला येउन भेटत होते, बातमीत आमच्या साहेबांचा नाव येऊ दया , त्यांच्या कडून पुष्प चक्र अर्पित करण्यात आले म्हणून. श्रधांजलि देणार्या नेत्यांची यादी लांब होत चालली होती. ५० रुपयांचे फुल वाहून अनेक वृत्तपत्रात प्रसिद्धि  मिलाविन्याची  ही संधि होती त्यांच्या साठी. मात्र दूसरी कड़े आजू बाजु च्या गावातील अनेक ऑटो रिक्शा वाले मुख्य मार्ग पासून गाँव  पर्यंत लोकाना निशुल्क सेवा देत होते. जेने करून जास्तीत जास्त लोकाना देशा साठी प्राण देणार्या वीर ला शेवटचा निरोप देता यावा. हा महाराष्ट्र त्या ऑटो रिक्शा वाल्यांचा आहे. प्रसिद्धि ला भुक्लेल्या राज्कर्त्यांचा नाही.

     महाराष्ट्रा च्या  नावावर आपला दूकान  चालवायला, महाराष्ट्र कुणाच्या बापाची जागीर नाही. आम्हा कोटि कोटि जनांचे ह्रदय स्पंदन आहे महाराष्ट्र. आम्हाला तोड्न्याचे प्रयत्न केले तर मुडक तोडून टाकू, याद राखा आम्ही शिवरायांचे वारसदार आहोत.
जय महाराष्ट्र.

प्रभाकर मिश्रा

6 टिप्‍पणियां:

  1. No one can say you are Non Maharashitrian because you have respect about maharashtra & shivaji it doesn't meant thousand of people come everday in mumbai pune kolahapur & all maharashtra districts have same respect
    Only one thing Hon. Raj Thackery try to say that stop those people but unfortunately people like you who respect Maharasthra as Work Place & Great respect has only only for your Birth Place.

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    1. काश ,के राज ठाकरे मी महारास्ट्राचा,महारास्ट्र माझा की जगह
      "मै भारत का ,भारत मेरा " कहता,
      काश के नेता ओछी राजनीती छोड़कर सिर्फ देश के लिए अच्छी राजनीती करते ,
      काश के रास्ट्रीय पार्टियाँ अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक की गन्दी राजनीती छोड़कर सिर्फ अच्छी भारतीय लोकतान्त्रिक राजनीती करती ,

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  2. Maza Nav Vikram Bairagi Jay Maharashtra don't try to teach maharashtrian about Nationalism because ones upon time We are those people who save all the Hindustan & Hindu people.
    You know Marathi very well but don't have maharashtrian people heart to understant so don't said you are Maharashtrian
    even you don't understand Raj Sahebs language.

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    1. काश ,के राज ठाकरे मी महारास्ट्राचा,महारास्ट्र माझा की जगह
      "मै भारत का ,भारत मेरा " कहता,
      काश के नेता ओछी राजनीती छोड़कर सिर्फ देश के लिए अच्छी राजनीती करते ,
      काश के रास्ट्रीय पार्टियाँ अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक की गन्दी राजनीती छोड़कर सिर्फ अच्छी भारतीय लोकतान्त्रिक राजनीती करती ,

      अगर कोई इस देश को बाटना चाहे तो सोचो किस हद तक बाँट सकता है,
      अंग्रेजो ने तो बस दो टुकड़े ही किये,क्योंकि वो बाहरी थे,दो सौ साल मे वो बस हिन्दू मुस्लमान ही समझ पाए,
      लेकिन जो पैदाइशी इस देश का है,वो अगर स्वार्थी हो जाए तो इस देश के इतने टुकड़े कर सकता है के अंग्रेज क्या उसके
      बाप भी नहीं गिन सकते,बांटो सबसे पहले हिन्दू,मुसलमान,सिख,इसाई,बौधिष्ट और धर्मों मे बांटो,फिर उन धर्मों के सैकड़ों जातियों मे,फिर बांटो उन जातियों की बड़ी छोटी जातियों मे,फिर कहते हैं के हर जात मे सात जाती होती है,फिर और बांटो .फिर प्रान्तों मे बांटो,फिर भाषाओं मे बांटो,हर प्रान्त मे कम से कम दो तीन भाषाएँ बोली जाती हैं,अक्सर हर प्रान्त मे एक ही भाषा के कई तरह के टोन होते है,और देखा गया है के एक ही भाषा के लोग एक दुसरे के टोन का मजाक बनाते है,इतना बंटवारा तो उनका हो रहा है जो देश की मुख्य धारा से जुड़े हैं,फिर जो बचते है वो जनजातियाँ,आदिवासी ,जो नक्सल की राह मे भटके हुए हैं ,उनमे बांटो,फिर बांटो आरक्षण के लिए,जो नए प्रदेश बनाने के लिए लिए लड़ रहे है(तेलंगाना जैसे ..)उनमे बांटो,उन कश्मीरियों को भड़काओ जो पकिस्तान में जाना चाहते है,उनको भी बांटो.नोर्थ-इस्ट को भी बांटो जो भारतीय की तरह दिखने के बजाये नेपाली और चाइना की तरह दीखते है.और हमारे भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है,हिंदी को सिर्फ जनसंपर्क की भाषा बना कर रख दिया है स्वार्थी नेताओं ने ,तो अपने-अपने प्रदेश की भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए लड़ाओ और बांटो.क्योंकि आज कल जनता की सोच वाला नेता नहीं बनता,बल्कि नेता की सोच वाली जनता पैदा हो जाती है,जो उन स्वार्थी नेताओं की तरह ही स्वार्थी होती है .इतना बंटवारा करने के बाद भी अगर जी न भरे तो कम से कम अमीर-गरीब में तो बाँट ही सकते है,पश्चिम में तो श्वेत-अश्वेत में बांटा जाता है उसको भी अपना सकते है बांटने के लिए.बांटो और अपनी ओछी राजनीती से अपनी पीडियों के लिए घर भरो.

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  3. काश ,के राज ठाकरे मी महारास्ट्राचा,महारास्ट्र माझा की जगह
    "मै भारत का ,भारत मेरा " कहता,
    काश के नेता ओछी राजनीती छोड़कर सिर्फ देश के लिए अच्छी राजनीती करते ,
    काश के रास्ट्रीय पार्टियाँ अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक की गन्दी राजनीती छोड़कर सिर्फ अच्छी भारतीय लोकतान्त्रिक राजनीती करती ,

    अगर कोई इस देश को बाटना चाहे तो सोचो किस हद तक बाँट सकता है,
    अंग्रेजो ने तो बस दो टुकड़े ही किये,क्योंकि वो बाहरी थे,दो सौ साल मे वो बस हिन्दू मुस्लमान ही समझ पाए,
    लेकिन जो पैदाइशी इस देश का है,वो अगर स्वार्थी हो जाए तो इस देश के इतने टुकड़े कर सकता है के अंग्रेज क्या उसके
    बाप भी नहीं गिन सकते,बांटो सबसे पहले हिन्दू,मुसलमान,सिख,इसाई,बौधिष्ट और धर्मों मे बांटो,फिर उन धर्मों के सैकड़ों जातियों मे,फिर बांटो उन जातियों की बड़ी छोटी जातियों मे,फिर कहते हैं के हर जात मे सात जाती होती है,फिर और बांटो .फिर प्रान्तों मे बांटो,फिर भाषाओं मे बांटो,हर प्रान्त मे कम से कम दो तीन भाषाएँ बोली जाती हैं,अक्सर हर प्रान्त मे एक ही भाषा के कई तरह के टोन होते है,और देखा गया है के एक ही भाषा के लोग एक दुसरे के टोन का मजाक बनाते है,इतना बंटवारा तो उनका हो रहा है जो देश की मुख्य धारा से जुड़े हैं,फिर जो बचते है वो जनजातियाँ,आदिवासी ,जो नक्सल की राह मे भटके हुए हैं ,उनमे बांटो,फिर बांटो आरक्षण के लिए,जो नए प्रदेश बनाने के लिए लिए लड़ रहे है(तेलंगाना जैसे ..)उनमे बांटो,उन कश्मीरियों को भड़काओ जो पकिस्तान में जाना चाहते है,उनको भी बांटो.नोर्थ-इस्ट को भी बांटो जो भारतीय की तरह दिखने के बजाये नेपाली और चाइना की तरह दीखते है.और हमारे भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है,हिंदी को सिर्फ जनसंपर्क की भाषा बना कर रख दिया है स्वार्थी नेताओं ने ,तो अपने-अपने प्रदेश की भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए लड़ाओ और बांटो.क्योंकि आज कल जनता की सोच वाला नेता नहीं बनता,बल्कि नेता की सोच वाली जनता पैदा हो जाती है,जो उन स्वार्थी नेताओं की तरह ही स्वार्थी होती है .इतना बंटवारा करने के बाद भी अगर जी न भरे तो कम से कम अमीर-गरीब में तो बाँट ही सकते है,पश्चिम में तो श्वेत-अश्वेत में बांटा जाता है उसको भी अपना सकते है बांटने के लिए.बांटो और अपनी ओछी राजनीती से अपनी पीडियों के लिए घर भरो.

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