आखिर संसद में अन्ना के आन्दोलन पर इतना आवेश और क्रोध कांग्रेस के राजकुमार को क्यों था. क्या वो सचमुच लोकतंत्र को खतरे में देख कर इतने अधीर और असंयमित हो गए थे. या फिर अपने राज्याभिषेक के सपने को एक जनांदोलन के सैलाब में तिनके की तरह बहता देख वो तिलमिला उठे. लोकतंत्र को ताक पर रखकर सिफारिश से कॉमनवेल्थ आयोजन समिति के अध्यक्ष बने कलमाड़ी ने जब देश की इज्जत तार तार की तब राहुल बाबा का खून नहीं खौला, जब रामदेवबाबा के लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन हुआ तब राहुल बाबा मम्मी के आँचल से बाहर नहीं आये. जब देश सड़कों पर अपने लोकतान्त्रिक अधिकार मांगने उतरा तो उनसे संवाद करने का नैतिक साहस युवराज के पास नहीं था. और अचानक से राहुल गाँधी लोकतंत्र की अस्मिता के ठेकेदार बन गए. वर्षों से इस देश को गाँधी नेहरु परिवार अपने बाप की जागीर समझता आ रहा है, आज जब अपने सपनों के रंग फीके हुए तो राहुल बाबा आपा खो बैठे. १२५ करोड़ भारतियों के सपनों से आप राजनेताओं ने पिछले ६४ साल से जो घिनौना खिलवाड़ किया है, उसके बाद अगर देश थोडा आक्रोश प्रदर्शित कर रहा है, तो राहुल जी समय आत्मावलोकन का है न की खीजने का.
शुक्रवार, 26 अगस्त 2011
मंगलवार, 29 मार्च 2011
बड़े दिन हुए
राह में भीड़
हर पड़ाव पर भीड़
भीड़ सपनों की,
भीड़ अपनों की,
जाने क्यूँ सफ़र में
है फिर भी तन्हाई .....
मंदिरों में पत्थर के बुत,
कार्यालय में कागज के पुलिंदे,
घर में सुविधाजनक उपकरण,
बड़े दिन हुए
माँ ने पीठ नहीं थपथपाई....
ऑफिस से घर तक
चौखट और दीवारें ,
जहाँ से बाहर
ना दे सुनाई और दिखाई.
बड़े दिन हुए ,
दोस्तों के साथ टपरी पर
चाय की चुस्की नहीं लगाईं...
माथे पर बल,
तनी हुई भौहें,
रंज तंज की बातें,
महत्वपूर्ण बातें,
बड़े दिन हुए
बेबात के ठिठौली नहीं उड़ाई...
बेरंग से रंग,
कभी फितरत के
कभी सीरत के,
कुदरत के रंग जाने क्यों रूठे है,
इस बार होली में वो बात नहीं आई ..
रविवार, 9 जनवरी 2011
बातों बातों में....
दिल मस्त हवा के झोंके सा
बह निकला बातों बातों में.....
मखमली खेतों से गुजरा
बैठा छूक-छूक गाड़ी में,
सपने भी हिचकोले खाते
संग संग मेरी आँखों में,
दिल मस्त हवा के झोंके सा
बह निकला बातों बातों में.....
सर्दी की धुप सा अहसास
लिए रात की करवट थी,
तारे बनकर छिटक गए अरमान,
जिन्हें सिरहाने रखकर सोता था रातों में,
दिल मस्त हवा के झोंके सा
बह निकला बातों बातों में.....
मोटे मोटे सपने हों,
और छोटी छोटी खुशियाँ हो,
छोटा सा एक आँगन हो
जिसमे थाम चलूँ
तेरा हाथ मै हाथों में,
दिल मस्त हवा के झोंके सा
बह निकला बातों बातों में.....
सोमवार, 27 दिसंबर 2010
Happy new year 2011
Happy new year 2011
आओ २०११ तुम्हारा स्वागत है.
कामना है, २०१० की परछाई से तुम उबर पाओ,
अपने लिए कोई नया मुस्तकबिल तलाश पाओ..
अवकाश के उपग्रह के विफल हो गिरने से
कंही ज्यादा दर्द तब हुआ
जब दिल्ली में किसी तेज रफ़्तार कार से
एक अबला का दुपट्टा गिरा...
उम्मीद है तुम गिरो नहीं
ऊँचे उठो
इतना जहाँ से तुम साफ़ देख सको
कश्मीर की सडको पर बिछे नौनिहालों के शव,
आदर्श सोसाइटी की इमारत,
राष्ट्रकुल स्पर्धा का खोकला गुब्बारा,
मै चाहता हूँ ,
तुम मुस्कुराओ ,
उन होंठो पर जो निवाला छूने को तरसते है...
मै चाहता हूँ
तुम चमको सपना बनकर ,
उन आँखों में जो भीगी है,
भला ये भी क्या बात हुई ,
एक शाम,
एक जाम,
और अगली सहर से कहानी वही आम,
कुछ तो नया हो इस नये साल में...
शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010
बलात्कार..
बैसाखियाँ सभी ने बांटी,
काश किसी ने दी होती
पैरो में चलने की जान..
मिटटी के चूल्हे में
दिल जल रहा था...
उबल रहे थे अरमान ..
तभी आदिवासी के दरवाजे पर दस्तक हुई,
आये थे एक और समाज सेवक मेहमान..
जुबान से शहद टपकाते
पूरी झोपडी में नज़र घुमाते
हर जरुरत को भांपा ..
हर दर्द की गहराई को
कागज पर नापा ...
जाते जाते समाज सेवक ने
विश्वास से कहा
आप पिछड़े है
हम आपका करेंगे सुधार..
दर्द खुली इज्जत सा बिखर गया ,
बेबस गरीबी का
फिर हो गया बलात्कार....
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
भ्रष्टाचार (Corruption in India)
भ्रष्टाचार की फितरत बदलिए
यह एक ऐसा अचार है जिसे खाता हर कोई है, पर पूछो तो कहते है खट्टा है नहीं खाना चाहिए. जब अरबों खरबों के भ्रष्टाचार की खबर आती है तो देश की आधी आबादी जो दो वक़्त के खाने को तरसती है, दिल ही दिल में कुढ़ के रह जाती है. पर जब दस की नोट दे कर गाँव में कोई सरकारी दाखला लेना हो तो कोई हर्ज नहीं. नेताजी से जब यही लोग किसी उत्सव का चंदा लेने पहुँचते है तो पचास हजार से कम नहीं मांगेंगे, क्या पता नहीं है यह पैसा कहाँ से आता है. सब चलता है...लोकसहभाग की योजनाओ में हमेशा लोगो का हिस्सा कोई ना कोई ठेकेदार भरता है ..पर अगर लोकनिर्माण की गुणवत्ता कमजोर है तो भ्रष्टाचार हो गया. स्कूल में ट्युशन, एडमिशन को डोनेशन से लेकर नौकरी पाने को गर्म की गयी जेबों तक हर कोई भ्रष्टाचार कर रहा है. इसीलिए तो किसी में इतना नैतिक साहस नहीं की छाती ठोक के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर सके. भ्रष्टाचार छोटा बड़ा नहीं होता ... आचरण भ्रष्ट है तो वो भ्रष्ट ही कहलायेगा. हम में से हर एक के जहन में एक सुरेश कलमाड़ी बैठा है. बस फर्क इतना है हमें छोटे मौके मिले तो हमने छोटे भ्रष्टाचार किया, कुछ लोगो को बड़ा मौका मिला तो उन्होंने देश को बड़ा चुना लगा दिया. पर फितरत तो एक ही है. पद पर बैठे मुख्यमंत्री बदले जा सकते है, फितरत बदलना मुश्किल है. बाहर बैठे भ्रष्टाचार को गाली देने में क्या वीरता है, अगर हम बहादूर है तो जरा अपने आप से भ्रष्टाचार को बाहर निकालिए.
बुधवार, 25 अगस्त 2010
मंजिल
मंजिल
हर दिल में कोई ना कोई जुस्तजू है,
पर ख्वाहिशो की जमीन पर हमेशा कलियाँ ही नहीं खिलती..
कुछ लोग कर लेते है उसूलों की कीमत पर सौदे,
बाकियों को कोई समझाये मंजिलें मुफ्त नहीं मिलती.
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